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₹20 में ‘बालू का आलू पराठा’, बाप-बेटे की मेहनत से चंबल में छोटा सा ढाबा बना लोगों की पहली पसंद

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शिवपुरी के गुना बायपास स्थित “बालू पराठा” का नाम जरूर लिया जाता है. इंडस्ट्रियल एरिया के पास एक साधारण से ढाबे में बनने वाला यह आलू का पराठा आज पूरे इलाके में अपनी अलग पहचान बना चुका है. इसकी खासियत सिर्फ इसका स्वाद नहीं, बल्कि इसके पीछे छिपी संघर्ष, मेहनत और पारिवारिक एकता की कहानी भी है

मध्य प्रदेश के चंबल क्षेत्र में अगर सस्ते और स्वादिष्ट खाने की बात होती है तो शिवपुरी के गुना बायपास स्थित ‘बालू पराठा’ का नाम जरूर लिया जाता है. इंडस्ट्रियल एरिया के पास एक साधारण से ढाबे में बनता यह आलू का पराठा आज पूरे इलाके में पहचान बना चुका है. इसकी सबसे खास बात सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि इसके पीछे खड़ी पिता-पुत्रों की मेहनत की कहानी है.करीब 15 साल पहले बालकृष्ण प्रजापति, जिन्हें लोग प्यार से ‘बालू’ कहते हैं, ने एक छोटे से ठिये पर आलू के पराठे बनाना शुरू किया था. उस समय पराठे की कीमत सिर्फ 10 रुपये थी। मकसद साफ था—कम दाम में लोगों को भरपेट और अच्छा खाना देना। शुरुआत आसान नहीं थी। सीमित साधन थे, लेकिन मेहनत और स्वाद पर भरोसा था.

धीरे-धीरे लोगों को बालू के हाथ का स्वाद पसंद आने लगा.ट्रक ड्राइवर, मजदूर और आसपास काम करने वाले लोग यहां रुकने लगे. फिर यह स्वाद लोगों की जुबान से होते हुए पूरे शिवपुरी में फैल गया. आज यहां सिर्फ आम लोग ही नहीं, बल्कि शहर की नामचीन हस्तियां भी पराठे का स्वाद लेने पहुंचती हैं.समय बदला, महंगाई बढ़ी, लेकिन बालू ने अपने ग्राहकों का भरोसा नहीं टूटने दिया. 10 रुपये का पराठा आज 20 रुपये का जरूर हो गया, लेकिन इसके साथ मिलने वाली थाली अब भी भरपूर है. एक आलू का गरमागरम पराठा, दो सब्जियां, दाल, अचार, सलाद और तली हुई हरी मिर्च. इतनी कम कीमत में इतना कुछ मिलना आज के दौर में किसी हैरानी से कम नहीं है.

चंबल में मशहूर बालू का आलू पराठा
बालू बताते हैं कि उनके पराठे का असली स्वाद देसी चूल्हे की धीमी आंच में छिपा है. आज भी पराठे गैस पर नहीं, बल्कि चूल्हे पर ही सेंके जाते हैं. यही वजह है कि हर पराठे में मिट्टी की सौंधी खुशबू और देसी स्वाद महसूस होता है.इस सफर में अब बालू अकेले नहीं हैं. उनके दोनों बेटे आकाश प्रजापति और विशाल प्रजापति भी इस काम में पूरी जिम्मेदारी से साथ खड़े हैं. दोनों सुबह से तैयारी में जुट जाते हैं. आटा गूंथने से लेकर पराठे तैयार करने तक की जिम्मेदारी संभालते हैं, जबकि बालू खुद तवे पर धीमी आंच में उन्हें सेंकते हैं.तीनों की यह जोड़ी ढाबे की असली ताकत है. पिता का अनुभव और बेटों की मेहनत ने इस छोटे से ढाबे को बड़ी पहचान दिलाई है. चंबल में ‘बालू पराठा’ सिर्फ खाने की जगह नहीं, बल्कि उस मेहनत, लगन और पारिवारिक एकता की मिसाल है, जिसने एक छोटे सपने को बड़ी पहचान में बदल दिया.



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