Last Updated:
इतिहास अक्सर उन्हीं को याद रखता है जिनके हाथों में ट्रॉफी होती है या जिनके नाम के आगे शतकों का अंबार होता है लेकिन क्रिकेट के पन्नों में एक नाम ऐसा भी है, जिसने कभी बल्ला घुमाकर मैच नहीं जिताया, बल्कि स्टंप्स के पीछे से अपनी ‘आवाज’ और ‘जुनून’ से पूरे मैच का भूगोल बदल दिया. वह नाम है सदानंद विश्वनाथ.
सदानंद विश्वनाथ की विकेटकीपिंग ने 1985 में मचा दिया था तहलका
नई दिल्ली. कुछ साल पहले एक मैच कवरेज के दौरान बैंगलुरु के चिन्नास्वामी स्टेडियम में एक शख्स मेरे बगल से निकला तो बरबस मेरे मुंह से निकल गया सदानंद भाई. वो शख्स पलटा तो लगा कही मैं गलत तो नहीं क्योंकि गोल्डन बॉल और प्रिंटेड पैंट में वो क्रिकेटर तो नहीं लग रहे थे.वो शख्स पलट कर मेरे पास आया और कहा बताइए. कुछ पल के लिए यकीन कर पाना मुश्किल हो रहा था कि यहीं वो शख्स है जिसकी कीपिंग ने वर्ल्ड चैंपियनशिप जिताने ने अहम रोल निभाया था.
क्रिकेट खेल का सबसे कड़वा सच यह है कि इतिहास अक्सर उन्हीं को याद रखता है जिनके हाथों में ट्रॉफी होती है या जिनके नाम के आगे शतकों का अंबार होता है लेकिन क्रिकेट के पन्नों में एक नाम ऐसा भी है, जिसने कभी बल्ला घुमाकर मैच नहीं जिताया, बल्कि स्टंप्स के पीछे से अपनी ‘आवाज’ और ‘जुनून’ से पूरे मैच का भूगोल बदल दिया. वह नाम है सदानंद विश्वनाथ.
शाबाश शिवा
साल 1985… ऑस्ट्रेलिया की धरती और सामने दुनिया के दिग्गज बल्लेबाज भारत की ओर से रवि शास्त्री और शिवा गेंद से कमाल कर रहे थे, लेकिन उस कमाल को हकीकत में बदल रहा था एक युवा कीपर सदानंद विश्वनाथ. जब वो चिल्लाते थे “शाबाश शिवा! पकड़े रख इसको! तो गेंदबाज की नसों में खून नहीं, बल्कि लावा दौड़ने लगता था. सुनील गावस्कर का कहना था कि जब पूरी टीम थकी होती थी, तब सदानंद की ऊर्जा एक ‘पावर हाउस’ की तरह सबको चार्ज कर देती थी.
कीपर है या जादूगर?
सदानंद की कीपिंग तकनीक नहीं कला थी. लक्ष्मण शिवारामा कृष्णन की फिरकी को पढ़ना दुनिया के बड़े-बड़े बल्लेबाजों के बस की बात नहीं थी, लेकिन सदानंद गेंद के टप्पा खाने से पहले ही भांप लेते थे कि गिल्लियां कब उड़ानी हैं. उनकी स्टंपिंग इतनी तेज थी कि कैमरा भी उन्हें कैद करने में मात खा जाता था.विदेशी कमेंटेटर्स कहते थे “यह कीपर है या जादूगर?” उनके हाथों में वो चुंबक जैसा खिंचाव था कि गेंद खुद-ब-खुद दस्तानों में समा जाती थी.
सदानंद का सूरज डूब गया
पर कहते हैं कि जो सितारे सबसे ज्यादा चमकते हैं, वे जल्दी टूट जाते हैं. सदानंद का करियर किसी ‘धूमकेतु’की तरह रहा उन्होंने आसमान को छुआ, दुनिया को अपना दीवाना बनाया, लेकिन फिर तकदीर ने करवट ली. पिता के निधन का गहरा सदमा और निजी जीवन के झंझावातों ने उस ‘लाइववायर’ के फोकस को हिला दिया. किरन मोरे और चंद्रकांत पंडित जैसे नाम सामने आए और सदानंद की वो कड़क आवाज धीरे-धीरे स्टेडियम के शोर में कहीं खो गई. सिर्फ 3 टेस्ट और 22 वनडे ये महज आंकड़े हैं। सच तो यह है कि उस दौर का हर क्रिकेट प्रेमी जानता है कि 1985 की वो जीत सदानंद के बिना अधूरी थी.
About the Author

मैं, राजीव मिश्रा, वर्तमान में नेटवर्क 18 में एसोसिएट स्पोर्ट्स एडिटर के रूप में कार्यरत हूँ. इस भूमिका में मैं डिजिटल स्पोर्ट्स कंटेंट की योजना, संपादकीय रणनीति और एंकरिंग की जिम्मेदारी निभाता हूँ. खेल पत्रका…और पढ़ें


