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Raja Vikramaditya Mau: उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद से राजा विक्रमादित्य का विक्रम संवत का इतिहास जुड़ा हुआ है. यह मऊ मुख्यालय से 34 किलोमीटर दूर देवकली देवलास स्थित ग्राम सभा में राजा विक्रमादित्य का चौखट है यहां राजा विक्रमादित्य के विक्रम संवत से जुड़े बत्तीसी की कहानी जुड़ी हुई है आज भी लोग इस चौखट का पूजा पाठ करते हैं. अब आइए जानते हैं क्या है यहां का महत्व…
Raja Vikramaditya Mau: उत्तर प्रदेश का मऊ जनपद सिर्फ अपनी बुनकरी के लिए ही नहीं, बल्कि अपने भीतर सदियों पुराने गौरवशाली इतिहास को समेटे हुए है. मऊ मुख्यालय से करीब 34 किलोमीटर दूर स्थित ‘देवकली देवलास’ वह स्थान है, जिसका सीधा संबंध न्यायप्रिय राजा विक्रमादित्य और उनके ‘विक्रम संवत’ से जुड़ा माना जाता है. यहां आज भी राजा विक्रमादित्य की वह ऐतिहासिक चौखट मौजूद है, जहां कभी उनकी ‘न्याय की अदालत’ लगा करती थी. लोक मान्यताओं और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, यह स्थान न केवल एक छावनी था, बल्कि यहां राजा विक्रमादित्य के सिंहासन से जुड़ी ‘सिंहासन बत्तीसी’ की गाथा भी जीवंत होती है. आइए विस्तार से जानते हैं इस अद्भुत स्थान के धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व के बारे में.
विक्रमादित्य की चौखट की होती है पूजा
लोकल 18 से बात करते हुए वहां की स्थानीय निवासी व प्रवक्ता विजय शंकर पांडेय बताते हैं कि कभी राजा भोग विक्रमादित्य की सिंघासन पर बैठना चाहता था. जिसमें 32 देवियों के पुतलियां बनी हुई थी. इस सिंहासन पर वहीं बैठ पाता था जो इन देवियों के द्वारा किए गए सवालों का सही जवाब दे पता था. उसके बैठने के लिए उस संस्कृति का हो, उस योग्य हो और उस धरातल का हो वही व्यक्ति उसे संगठन पर बैठ सकता था क्योंकि देवी प्रतिमाओं से संपन्न यह सिंहासन था पर सिंहासन पर हर कोई नहीं बैठता था. इस स्थान को विक्रमादित्य का कोट कहा जाता है यही वजह है कि यहां बने चौखट का लोग पूजा पाठ करते हैं.
विक्रमादित्य की इसी चौखट से चलती थी उनकी कोर्ट
विजय शंकर पांडेय ने बताया कि आजमगढ़ जनपद के गजेटियर में यह दर्ज है कि यह विक्रमादित्य की छावनी के रूप में बताया गया. यह स्थान देवर्षि देवल से जुड़ा हुआ है भगवान श्री राम से जुड़ा हुआ है सूर्य पूजा से जुड़ा हुआ यह स्थान है. इस स्थान पर यह जो चौखट बना हुआ है इसी स्थान पर राजा विक्रमादित्य की कोर्ट लगती थी. इसी वजह से इस चौखट की लोग आज भी पूजा पाठ करते हैं. इस स्थान से अगल-बगल कई सरोवर बनाए गए हैं जहां तुलसी सरोवर, सूर्यकुंड समेत तमाम सरोवर हैं. क्योंकि यह कभी राजा विक्रमादित्य का गढ़ माना जाता था और मान्यता है कि उनकी राज्य का पूर्वी गेट यही था.
अंग्रेजों ने गजेटियर में दर्ज कराया विक्रमादित्य की छावनी
अंग्रेजों ने गजेटियर में यह दर्ज कराया है कि यह विक्रम आदित्य की छावनी का स्थान है. और जो गजेटियर में उल्लेख है वह वास्तव में यह छावनी के रूप में रही है. हालांकि समय को देखते हुए इन स्थानों पर निर्माण कार्य बढ़ता जा रहा है और यहां दर्जनों से अधिक मंदिर स्थापित है. इससे यह माना जाता है कि राजा विक्रमादित्य के विक्रय बत्तीसी की कहानी इस स्थान से जुड़ी हुई है. क्योंकि इस स्थान पर कई मंदिर है और राजा विक्रमादित्य के कोर्ट का चौखट विराजमान है इस चौखट से बत्तीसी की कहानी जुड़ी हुई है जहां आज भी लोग पूजा पाठ करते हैं.
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राहुल गोयल न्यूज़ 18 हिंदी में हाइपरलोकल (यूपी, उत्तराखंड, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश) के लिए काम कर रहे हैं. मीडिया इंडस्ट्री में उन्हें 16 साल से ज्यादा का अनुभव है, जिसमें उनका फोकस हमेशा न्यू मीडिया और उसके त…और पढ़ें


