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फ्रांस, अमेरिका, जापान को भूल जाओ… भारत के वैज्ञानिकों ने बनाया जादुई रिएक्टर, होमी भाभा का 70 पुराना सपना साकार

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दुनिया के विकसित देश आज जिस तकनीक को अपनाने से कतरा रहे हैं, सुरक्षा कारणों से अपने हाथ पीछे खींच रहे हैं, उसी जटिल परमाणु तकनीक में भारत ने तिरंगा फहरा दिया है. तमिलनाडु के कलपक्कम स्थित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने ‘क्रिटिकलिटी’ (Criticality) हासिल कर ली है. परमाणु विज्ञान की भाषा में क्रिटिकलिटी का मतलब वह बिंदु है, जहां रिएक्टर के भीतर न्यूक्लियर चेन रिएक्शन आत्मनिर्भर हो जाती है और ऊर्जा का निरंतर उत्पादन शुरू हो जाता है. यह कोई साधारण उपलब्धि नहीं है. यह भारत की लंबी परमाणु यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है. हमें अगले सात सौ सालों तक ऊर्जा के मामले में ‘बेफिक्र’ कर सकता है.

आमतौर पर हम जानते हैं कि किसी भी ईंधन को जलाने पर वह खत्म हो जाता है. लेकिन फास्ट ब्रीडर रिएक्टर विज्ञान के उस करिश्मे पर आधारित है, जो आम सोच के विपरीत है. जैसा कि कलपक्कम स्थित इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR) के निदेशक श्रीकुमार पिल्लई ने समझाया, ‘ब्रीडर रिएक्टर का मतलब है कि अगर आप रिएक्टर में X मात्रा में ईंधन डालते हैं, तो इस्तेमाल के बाद निकले ईंधन में ईंधन की मात्रा ‘X’ से ज्यादा होगी.

जितनी ईंधन की खपत, उतने ईंधन बनेंगे

PFBR का ‘ब्रीडिंग रेशियो’ लगभग 1.05 है. इसका मतलब है कि यह रिएक्टर जितना ईंधन खपत करेगा, उससे कहीं ज्यादा नया ईंधन पैदा करेगा. यह तकनीक यूरेनियम-238 जैसे उपजाऊ पदार्थों का उपयोग करती है, जो न्यूट्रॉन सोखकर नए प्लूटोनियम में बदल जाते हैं. PFBR का ‘ब्रीडिंग रेशियो’ लगभग 1.05 है. इसका मतलब है कि यह रिएक्टर जितना ईंधन खपत करेगा, उससे कहीं ज्यादा नया ईंधन पैदा करेगा. यह तकनीक यूरेनियम-238 जैसे उपजाऊ पदार्थों का उपयोग करती है, जो न्यूट्रॉन सोखकर नए प्लूटोनियम में बदल जाते हैं.

होमी जहांगीर भाभा का वो सपना, जो अब सच हुआ

भारत की यह परमाणु गाथा डॉ. होमी जहांगीर भाभा के ‘तीन चरणों वाले परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम’ पर आधारित है.

  • पहला चरण: प्राकृतिक यूरेनियम का उपयोग कर बिजली बनाना और उप-उत्पाद (By-product) के रूप में प्लूटोनियम-239 तैयार करना.
  • दूसरा चरण: इसी प्लूटोनियम को ईंधन के रूप में इस्तेमाल कर फास्ट ब्रीडर रिएक्टर चलाना. कलपक्कम का PFBR इसी दूसरे चरण की शुरुआत है.
  • तीसरा चरण: थोरियम का उपयोग. थोरियम खुद सीधे ईंधन नहीं है, लेकिन फास्ट रिएक्टरों के भीतर इसे यूरेनियम-233 में बदला जा सकता है, जो आने वाली सदियों के लिए भारत का मुख्य ईंधन होगा.

भारत ने 1960 के दशक के मध्य में ही प्लूटोनियम रिप्रोसेसिंग तकनीक पर काम शुरू कर दिया था और आज भारत उन गिने-चुने देशों में शामिल है जिसने ‘क्लोज्ड फ्यूल साइकिल’ में महारत हासिल की है.

थोरियम का ‘ब्रह्मास्त्र’

भारत के पास दुनिया के कुल थोरियम भंडार का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा मौजूद है. यूरेनियम के मामले में भारत उतना संपन्न नहीं है. इसलिए थोरियम हमारे लिए ‘ऊर्जा का खजाना’ है. एक बार जब थोरियम आधारित सिस्टम पूरी तरह से तैनात हो जाएंगे, तो निदेशक श्रीकुमार पिल्लई के अनुसार, ‘भारत के लिए कम से कम 500 से 700 वर्षों की ऊर्जा सुरक्षा की गारंटी दी जा सकती है.’

दुनिया क्यों डरी, भारत क्यों अडिग रहा?

जापान, फ्रांस और अमेरिका जैसे देशों ने भी फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों पर काम किया था, लेकिन वे सफल नहीं हो सके.

  • जापान: 1995 में जापान के ‘मोंजू’ (Monju) रिएक्टर में सोडियम लीक के कारण आग लग गई थी, जिससे जनता का भरोसा टूट गया और अंततः प्रोजेक्ट बंद करना पड़ा.
  • फ्रांस: फ्रांस के ‘सुपरफिनिक्स’ (Superphénix) को तकनीकी समस्याओं और उच्च लागत के कारण बंद कर दिया गया.
  • अमेरिका: अमेरिका के पास यूरेनियम की पर्याप्त आपूर्ति थी, इसलिए उन्होंने रिप्रोसेसिंग और ब्रीडर तकनीक में अपनी रुचि खो दी.
  • भारत पीछे नहीं हट सकता था क्योंकि हमारी ऊर्जा जरूरतें आयातित तेल और गैस पर निर्भर हैं. भारत को अपनी बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए एक स्थिर ‘बेस लोड पावर’ की आवश्यकता थी, जिस पर वैश्विक भू-राजनीति का असर न पड़े.

लिक्विड सोडियम: सबसे बड़ी चुनौती और भारत का अनुभव

फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों में लिक्विड सोडियम का उपयोग कूलेंट (शीतलक) के रूप में किया जाता है. सोडियम पानी और हवा के संपर्क में आने पर बहुत हिंसक प्रतिक्रिया करता है, जिससे आग लग सकती है. भारत का आत्मविश्वास इस मामले में बहुत मजबूत है क्योंकि हमारे पास 1985 से फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (FBTR) चलाने का लगभग चार दशकों का अनुभव है. हमने सोडियम लीकेज को पकड़ने वाले सेंसर, विशेष अग्निशमन तकनीक और सोडियम की आग बुझाने के लिए खास केमिकल पाउडर तक विकसित किए हैं. ब्रीडर तकनीक का सबसे कठिन हिस्सा ‘स्टीम जनरेटर’ बनाना है जहां सोडियम और पानी के बीच पूर्ण अलगाव बनाए रखना होता है. कलपक्कम का रिएक्टर इसी दीर्घकालिक अनुभव का परिणाम है.

लागत और भविष्य का रोडमैप

PFBR की निर्माण लागत काफी अधिक है. लगभग 30 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे अनुभव बढ़ेगा और डिजाइन स्थिर होंगे, निर्माण का समय और लागत दोनों में भारी गिरावट आएगी. कलपक्कम में अब फास्ट ब्रीडर रिएक्टर 1 और 2 के डिजाइन पर काम शुरू हो चुका है. वहां एक ‘फास्ट रिएक्टर फ्यूल साइकिल फैसिलिटी’ भी बनाई जा रही है, जो परमाणु ईंधन को वहीं रिप्रोसेस और फिर से तैयार करेगी, जिससे पूरा चक्र एक ही जगह पर पूरा होगा.

2047 से पहले ऊर्जा के सेक्टर में आत्मनिर्भरता

भारत का लक्ष्य 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु क्षमता हासिल करना और 2070 तक ‘नेट जीरो’ उत्सर्जन के लक्ष्य को प्राप्त करना है. कलपक्कम आज एक ऐसी जगह बन गया है जहां भारत के परमाणु कार्यक्रम के तीनों चरण एक साथ दिखाई देते हैं- प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर से लेकर फास्ट ब्रीडर और थोरियम की राह तक. कलपक्कम का अर्थ भले ही ‘पथरीली जगह’ हो, और यह सफर भी पथरीला रहा है, लेकिन PFBR की क्रिटिकलिटी ने भारत की ऊर्जा की भूख का स्थायी समाधान ढूंढ लिया है.



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