Last Updated:
Lok Sabha Seat Increase Plan: महिला आरक्षण कानून में संशोधन और परिसीमन को लेकर इन दिनों राजनीतिक माहौल गर्माया हुआ है. इन दोनों के साथ तीन विधेयकों पर लोकसभा में मैराथन बहस चल रही है. विपक्ष के सवालों का सत्ता पक्ष ने मुकम्मल तरीके से जवाब दिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सदन को इस मसले पर संबोधित किया. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने खासतौर पर परिसीमन पर पूरे विपक्ष को अच्छे तरीके से समझाया भी. फिर भी विरोध के सुर शांत नहीं हो रहे हैं.
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा सीटें 50 फीसद तक बढ़ाने के बारे में पूरा गणित समझाया, इसके बावजूद विपक्ष विरोध पर अड़ा है. (फोटो: PTI)
Lok Sabha Seat Increase Plan: लोकसभा में सीटों के संभावित पुनर्निर्धारण यानी परिसीमन (डिलिमिटेशन) को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है. गुरुवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) ने लोकसभा में चली रही बहस में हस्तक्षेप करते हुए सरकार का पक्ष मजबूती से रखा और यह स्पष्ट किया कि लोकसभा की कुल सीटें बढ़ाकर 850 किए जाने की स्थिति में सभी राज्यों को लगभग 50 प्रतिशत अधिक सीटें मिलेंगी. उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि किसी भी राज्य, खासकर दक्षिणी राज्यों, की मौजूदा हिस्सेदारी में कमी नहीं आएगी.
गृह मंत्री अमित शाह का यह बयान ऐसे समय में आया है जब डिलिमिटेशन का मुद्दा खासतौर पर दक्षिण भारत में राजनीतिक रूप से संवेदनशील बन चुका है. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन (MK Stalin) समेत कई विपक्षी नेता यह आशंका जता रहे हैं कि नई जनसंख्या आधारित प्रक्रिया से हिंदी भाषी राज्यों को फायदा मिल सकता है, जिससे दक्षिणी राज्यों का प्रभाव घट सकता है. अमित शाह ने इन आशंकाओं को खारिज करते हुए आंकड़ों के जरिए स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की. उदाहरण के तौर पर उन्होंने कहा कि तमिलनाडु की लोकसभा सीटें 39 से बढ़कर लगभग 59 हो जाएंगी, यानी राज्य की लोकसभा सीटों में कुल हिस्सेदारी में गिरावट नहीं बल्कि वृद्धि ही होगी. सरकार का तर्क है कि जब सभी राज्यों की सीटें समान अनुपात में बढ़ेंगी, तो नुकसान की आशंका तर्कसंगत नहीं है.
एमके स्टालिन की रणनीति और विपक्ष के तेवर
हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल गणितीय तर्कों तक सीमित नहीं है. सीएम स्टालिन ने इस मुद्दे (परिसीमन) को चुनावी रणनीति का हिस्सा बना लिया है. तमिलनाडु में आगामी चुनावों को देखते हुए डिलिमिटेशन को केंद्र बनाम राज्य के अधिकारों की बहस के रूप में पेश किया जा रहा है. इससे यह मुद्दा जमीनी स्तर पर भावनात्मक और राजनीतिक रंग ले चुका है. इसी वजह से अमित शाह के स्पष्टीकरण के बावजूद विपक्ष के तेवर नरम पड़ते नहीं दिख रहे हैं. संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह इस मुद्दे पर स्पष्ट राजनीतिक रेखाएं खिंचती नजर आ रही हैं. अब सबकी नजर उस संवैधानिक संशोधन विधेयक पर है, जिसे पारित करने के लिए दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी. यह किसी भी सरकार के लिए एक चुनौतीपूर्ण लक्ष्य होता है.
विधेयक पारित नहीं हुआ तो?
अगर यह विधेयक पारित नहीं हो पाता, तो विपक्ष इसे अपनी बड़ी राजनीतिक जीत के रूप में पेश कर सकता है. खासतौर पर MK Stalin जैसे नेता इसे अपने राज्य के हितों की रक्षा के रूप में जनता के सामने रखेंगे. वहीं, भारतीय जनता पार्टी इस पूरे घटनाक्रम को व्यापक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देख रही है. पार्टी की रणनीति केवल डिलिमिटेशन तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य मुद्दों को भी समानांतर रूप से आगे बढ़ाने की है. पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में (जहां महिला मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं) पार्टी महिला आरक्षण विधेयक को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है. सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री के आगामी चुनावी दौरे में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया जा सकता है, जिसमें विपक्ष पर महिलाओं के सशक्तीकरण में बाधा डालने का आरोप लगाया जाएगा.
संख्या बल और सरकार की उम्मीद
संसद के भीतर फिलहाल संख्या बल का समीकरण बेहद करीबी बना हुआ है. सरकार को उम्मीद है कि कुछ विपक्षी दल मतदान से दूरी बना सकते हैं, जिससे बहुमत का आंकड़ा हासिल करना आसान हो जाए. हालांकि, यह रणनीति पूरी तरह अनिश्चितताओं पर निर्भर करती है. डिलिमिटेशन का यह विवाद दिखाता है कि किस तरह एक तकनीकी और प्रशासनिक प्रक्रिया भी भारतीय राजनीति में बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकती है. सरकार जहां आंकड़ों के आधार पर आश्वस्त करने की कोशिश कर रही है, वहीं विपक्ष इसे संभावित असंतुलन और क्षेत्रीय असमानता के खतरे के रूप में पेश कर रहा है. ऐसे में यह बहस केवल तथ्यों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि धारणाओं और राजनीतिक रणनीतियों के बीच एक अहम संघर्ष बन चुकी है.
About the Author

CNN News18 में सीनियर एडिटर (पॉलिटिक्स) अमन शर्मा News18.com के ब्यूरो चीफ है. इन्हें PMO समेत देश की बड़ी राजनीतिक गतिविधियों की कवरेज का दो दशक से ज्यादा का अनुभव है. राजनीतिक घटनाक्रमों पर पैनी पकड़ रखते हैं…और पढ़ें


