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जब मैदान पर होती थी ‘सफेद कपड़े में डकैती’, वो दौर जहां टीमों में थी दो लोगों की दहशत, 22 गज की पिच पर होता था ‘नंगा नाच’

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जब मैदान पर होती थी ‘सफेद कपड़े में डकैती’, वो दौर जहां दो लोगों की थी दहशत

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आज के दौर में जहां DRS और अत्याधुनिक तकनीक ने अंपायरिंग की गलतियों को कम कर दिया है, वहीं 80 के दशक में पाकिस्तान का दौरा किसी भी विदेशी टीम के लिए किसी बुरे सपने जैसा था. उस दौर में शकूर राणा और खिज्र हयात के फैसलों को ‘सफेद कपड़े में डकैती’ कहा जाता था. 

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80 के दशक का वो दौर जब पाकिस्तान के अंपायर सफेद कपड़ों में डालते थे विरोधी टीमों पर डकैती

नई दिल्ली. 80 के दशक में जब क्रिकेट की दुनिया में वेस्टइंडीज की खौफनाक रफ्तार और भारत की नईनई विश्व विजय की चर्चा थी, उसी दौर में पाकिस्तान के मैदानों पर बल्ले और गेंद के अलावा दो और नाम थे जिनसे दुनिया भर की टीमें थर-थर कांपती थीं वे खिलाड़ी नहीं थे, बल्कि सफेद कोट पहने ‘अंपायर’ थे शकूर राणा और खिज्र हयात. इन्हें क्रिकेट इतिहास का ‘असली विलेन’ माना जाता है, जिन्होंने अपनी विवादास्पद अंपायरिंग से न केवल मैच पलटे, बल्कि आईसीसी को क्रिकेट के नियम बदलने पर मजबूर कर दिया.

आज के दौर में जहां DRS और अत्याधुनिक तकनीक ने अंपायरिंग की गलतियों को कम कर दिया है, वहीं 80 के दशक में पाकिस्तान का दौरा किसी भी विदेशी टीम के लिए किसी बुरे सपने जैसा था. उस दौर में शकूर राणा और खिज्र हयात के फैसलों को ‘सफेद कपड़े में डकैती’ कहा जाता था.

शकूर राणा: वो अंपायर जिसने माइक गेटिंग को सरेआम दी गाली

शकूर राणा का नाम आते ही 1987 का वो फैसलाबाद टेस्ट याद आता है, जिसने इंग्लैंड और पाकिस्तान के बीच राजनयिक संबंध तक बिगाड़ दिए थे. शकूर राणा ने इंग्लैंड के कप्तान माइक गेटिंग को बीच मैदान पर उंगली दिखाकर सरेआम खरी-खोटी सुनाई थी. विवाद इतना बढ़ा कि अंपायर ने मैच बीच में रुकवा दिया.
विदेशी टीमों का आरोप था कि राणा पाकिस्तानी बल्लेबाजों को आउट नहीं देखते थे, जबकि विदेशी बल्लेबाजों को मामूली अपील पर भी पवेलियन भेज देते थे. उनके कड़े तेवर और ‘होम अंपायर’ होने का फायदा उठाने की छवि ने उन्हें क्रिकेट का सबसे बड़ा विलेन बना दिया.

 खिज्र हयात: उंगली उठाने में सबसे तेज

खिज्र हयात का आतंक भी कुछ कम नहीं था. कहा जाता था कि उनके सामने अपील करना ही बल्लेबाज के लिए खतरा था.  1989-90 में जब भारतीय टीम पाकिस्तान गई थी, तब खिज्र हयात के कई फैसलों ने भारतीय खिलाड़ियों, खासकर कपिल देव और श्रीकांत को आगबबूला कर दिया था.  विदेशी मीडिया ने उन्हें अक्सर ‘पाकिस्तान का 12वां खिलाड़ी’ करार दिया. उनके फैसलों में निष्पक्षता की इतनी कमी दिखती थी कि विपक्षी टीमें टॉस जीतने से पहले ही हार मान लेती थीं.

जब अंपायरों की वजह से ICC हुआ मजबूर

इन दोनों अंपायरों की पक्षपाती अंपायरिंग और मैदान पर होने वाले झगड़ों ने आईसीसी की साख पर सवाल खड़े कर दिए थे. वेस्टइंडीज के कप्तान क्लाइव लॉयड से लेकर ऑस्ट्रेलिया के दिग्गज खिलाड़ियों तक, सबने पाकिस्तानी अंपायरों की शिकायत की. नतीजा यह हुआ कि क्रिकेट की दुनिया में यह मांग उठी कि घरेलू अंपायर निष्पक्ष नहीं हो सकते. पाकिस्तान के ही कप्तान इमरान खान ने पहली बार 1986 में भारत के खिलाफ घरेलू सीरीज में ‘न्यूट्रल अंपायर्स’ (तटस्थ अंपायर) बुलाने की वकालत की. अंततः आईसीसी ने नियम बनाया कि टेस्ट मैचों में अब अंपायर मेजबान देश के नहीं, बल्कि किसी तीसरे देश के होंगे.

शकूर राणा और खिज्र हयात ने भले ही अपने समय में पाकिस्तानी टीम को फायदा पहुँचाया हो, लेकिन उनकी ‘खतरनाक’ अंपायरिंग ने क्रिकेट को वो तोहफा दिया जिसे आज हम ‘न्यूट्रल अंपायरिंग’ के रूप में जानते हैं.  उन्होंने साबित कर दिया कि खेल की गरिमा अंपायर की उंगली में नहीं, बल्कि उसकी निष्पक्षता में होती है.



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