18.5 C
Munich

फर्रुखाबाद की डलिया I Farrukhabad news

Must read


Last Updated:

फर्रुखाबाद के कारीगरों की पारंपरिक ‘डलिया’ अपनी मजबूती और उपयोगिता के कारण लंबे समय से पहचान बनाए हुए है. अरहर, बहेड़ा और शहतूत की लकड़ी से तैयार की जाने वाली यह डलिया घरों से लेकर खेतों तक उपयोग में लाई जाती है. ‘एक जिला एक उत्पाद’ योजना से कारीगरों को कुछ सहारा जरूर मिला है, लेकिन कच्चे माल की कमी और बढ़ती लागत ने उनके सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं.

फर्रुखाबाद. देशभर में फर्रुखाबाद के कारीगर अपनी कारीगरी के दम पर जाने जाते हैं, उनकी इस प्रतिभा को कई दशकों से कोई विशेष पहचान नहीं मिली है. योजना एक जिला एक उत्पाद के तहत इनको सहारा मिला है, जिससे यह अपने पुश्तैनी काम को आगे बढ़ा सकते हैं. इसको लेकर यहां पर अरहर की लकड़ियों से बनाते हैं. घर से लेकर खेतों में भी प्राचीन समय से ही प्रयोग में लाई जाने वाली यह लकड़ी से बनी दलिया बहुत ही खास होती है. जिस प्रकार इसका प्रयोग सब्जियों में भी किया जाता है, ऐसे में यह डलिया फर्रुखाबाद की पहचान बन चुकी है. यहां के कारीगर इसे कई बरसों से बनाते आ रहे हैं, जिससे अच्छा कारोबार होता है. डलिया की दूसरे जनपदों में भी बिक्री होती है, लेकिन लगातार मांग बढ़ने के बावजूद इनके रोजगार में काफी मुश्किलें आ रही हैं. स्थिति ऐसी हो गई है कि गुजारा भी मुश्किल हो रहा है.

पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ रही परंपरा
ब्लॉक के रजीपुर के ग्रामीण बताते हैं कि उनका यह कार्य कई पीढ़ियों से चलता आ रहा है, लेकिन समय बदलने के साथ अब इस काम से भरण-पोषण नहीं हो पा रहा है. कमालगंज क्षेत्र के कई गांवों में ग्रामीण इस लकड़ी की कारीगरी करके अपना गुजारा करते हैं, लेकिन स्थानीय बाजार में अरहर की फसल कम होने के कारण अब यहां लकड़ियां नहीं मिलती हैं. इसके चलते कारीगरों को मध्य प्रदेश, महोबा और बुंदेलखंड जैसे जिलों से लकड़ी खरीदनी पड़ती है. वहां से लाने में किराया अधिक पड़ता है, जिससे लागत बढ़ जाती है. एक डलिया बनाने में लगभग 50 रुपए की लागत आती है, जबकि इसकी कीमत अधिकतम 75 रुपए तक ही मिल पाती है. राम बक्श बताते हैं कि वह एक महीने में अधिकतम 3 से 5 हजार रुपए ही कमा पाते हैं. इतनी कम आमदनी में गुजारा करना मुश्किल हो गया है.

किस लकड़ी का होता है प्रयोग
मजबूती की बात करें तो अरहर, बहेड़ा और शहतूत की लकड़ी सबसे अच्छी मानी जाती है. यह पतली, लचीली और मजबूत होती है, जिससे कारीगर अच्छी गुणवत्ता की डालियां तैयार करते हैं. दुकानदार बताते हैं कि पहले अरहर की खेती अधिक होती थी, जिससे यहां आसानी से लकड़ी मिल जाती थी. लेकिन अब आलू जैसी फसलों का रकबा बढ़ने से अरहर की खेती कम हो गई है. ऐसे में इन्हें मध्य प्रदेश के चंबल क्षेत्र से अरहर की लकड़ी मंगानी पड़ती है, जो काफी महंगी होती है. इसके साथ ही ट्रांसपोर्ट का खर्च भी अधिक होता है, जिससे यह व्यवसाय कठिन होता जा रहा है. लागत बढ़ने के बावजूद बचत कम हो रही है, फिर भी कारीगर इस परंपरागत काम को आगे बढ़ा रहे हैं.

About the Author

Monali Paul

नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें



Source link

- Advertisement -spot_img

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisement -spot_img

Latest article