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‘दीदी नहीं, इस बार दादा चाहिए’, नंदीग्राम में सुभेंदु अधिकारी ने कैसे सेट कर दिया ‘हिंदुत्व’ का यह नया नैरेटिव?

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नंदीग्राम: बंगाल का चुनाव अपने चरम पर है और इस सियासी उफान के बीच नंदीग्राम एक बार फिर सबसे बड़े केंद्र के तौर पर उभर रहा है. यह सीट सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति का वो अखाड़ा है, जहां से उठने वाली हर आवाज कोलकाता की सत्ता तक सीधा असर डालती है. मौजूदा माहौल की बात करें, तो नंदीग्राम की जमीन पर ‘परिवर्तन’ की मांग साफ सुनाई दे रही है. कई स्थानीय लोग खुलकर कहते हैं कि उन्हें बदलाव चाहिए. उनका आरोप है कि ममता बनर्जी की सरकार ने वादे पूरे नहीं किए और उन्हें ठगा गया. कुछ लोगों का यह भी कहना है कि उनकी धार्मिक पहचान, खासतौर पर हिंदुओं की आवाज को दबाया गया है.

इसी माहौल को बीजेपी और खासतौर पर शुभेंदु अधिकारी ने बारीकी से समझा है. उनकी रणनीति में हिंदू वोटर को आक्रामक तरीके से साधने की कोशिश साफ नजर आती है. नंदीग्राम में उनकी रैलियों और रोड शो में एक ही नारा बार-बार गूंजता है- ‘जय श्री राम’. मंच से लेकर भीड़ तक, राम के भजन और गीतों के जरिए एक खास चुनावी माहौल तैयार किया जा रहा है.

जमीन पर तस्वीर और भी स्पष्ट हो जाती है. नंदीग्राम के चौक-चौराहों पर बीजेपी के झंडों के साथ-साथ ‘जय श्री राम’ लिखे पोस्टर, भगवा झंडे और धार्मिक प्रतीक बड़ी संख्या में दिखाई देते हैं. स्थानीय लोगों से बातचीत में भी एक लाइन बार-बार सुनने को मिलती है- ‘दादा चाहिए, क्योंकि परिवर्तन करना है… अपनी आवाज बुलंद करनी है.’

ममता बनर्जी और सुवेंदु अधिकारी के बीच सीधी टक्कर है. फोटो- पीटीआई

‘दादा’ के पक्ष में क्यों मुड़ रही है हवा?

इसी बीच, जब News18 India ने शुभेंदु अधिकारी से सीधे सवाल किया कि नंदीग्राम में बीजेपी के मुकाबले हिंदू प्रतीक और ‘जय श्री राम’ के पोस्टर ज्यादा क्यों नजर आते हैं? क्या चुनाव हिंदू बनाम मुस्लिम होता जा रहा है? तो उन्होंने साफ तौर पर अपनी बात रखी.

नंदीग्राम का ऐतिहासिक और राजनीतिक महत्व

शुभेंदु अधिकारी का कहना था कि ममता बनर्जी के शासन में हिंदू समुदाय को परेशानियों का सामना करना पड़ा है. उन्होंने आरोप लगाया कि हिंदुओं को पलायन करना पड़ा, रोजगार के अवसर नहीं मिले और उन्हें अत्याचार झेलना पड़ा. उनके मुताबिक, यही वजह है कि बीजेपी आज ‘हिंदुओं की आवाज’ उठा रही है और बंगाल का हिंदू समुदाय उनके साथ खड़ा है.

टीएमसी की जवाबी रणनीति

उनका यह बयान यह भी दिखाता है कि बीजेपी अपने चुनावी नैरेटिव को किस दिशा में ले जा रही है. पार्टी यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि अगर ममता बनर्जी पर किसी एक समुदाय के पक्ष में होने के आरोप लगते हैं, तो बीजेपी खुद को एक ऐसे विकल्प के रूप में पेश कर रही है जो हिंदुओं की ‘अस्मिता’ की रक्षा कर सकती है.

2026 चुनाव में भवानीपुर में ममता बनर्जी और सुवेंदु अधिकारी में जबरदस्त मुकाबला होने की उम्मीद.

नंदीग्राम की धरती से एक बड़े बदलाव की शुरुआत

अगर इसके राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें, तो नंदीग्राम का महत्व और भी स्पष्ट हो जाता है. 2007 का भूमि अधिग्रहण आंदोलन यहीं से उठा था, जिसने पूरे पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा बदल दी. इसी आंदोलन ने वाम मोर्चा की लंबी सत्ता को कमजोर किया और ममता बनर्जी के सत्ता में आने की जमीन तैयार की.

ममता बदला लेंगी या सिकंदर बनेंगे सुभेंदु?

इसके बाद से नंदीग्राम सत्ता और संघर्ष का प्रतीक बन गया. 2021 के विधानसभा चुनाव में भी यह सीट पूरे देश की नजरों में रही, जब ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी आमने-सामने थे और इस मुकाबले में शुभेंदु अधिकारी ने जीत हासिल की.



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