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Asaram News | Gujarat High Court | Encroachment Verdict – साबरमती किनारे कब्जे पर हाईकोर्ट सख्त, आसाराम आश्रम को डबल बेंच से भी राहत नहीं

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जज साहब, स‍िंगल बेंच का फैसला गलत है, आसाराम आश्रम पहुंचा डबल बेंच

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Asaram Lates News: गुजरात हाईकोर्ट ने आसाराम से जुड़े ट्रस्ट की याचिका खारिज करते हुए उसे ‘आदतन अपराधी’ करार दिया. कोर्ट ने कहा कि ट्रस्ट ने जमीन आवंटन की शर्तों का उल्लंघन करते हुए साबरमती नदी किनारे तक अवैध कब्जा किया.

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आसाराम आश्रम को लेकर गुजरात हाईकोर्ट ने क्‍या कहा. (फाइल फोटो)

अहमदाबाद. गुजरात हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने आसाराम से जुड़े ट्रस्ट को बड़ा झटका देते हुए उसकी याचिकाएं खारिज कर दीं. ट्रस्ट ने सरकारी जमीन पर कथित कब्जे और बेदखली की कार्रवाई को चुनौती दी थी लेकिन कोर्ट ने सिंगल बेंच के फैसले को पूरी तरह सही ठहराया है.

चीफ जस्टिस सुनीता अग्रवाल और जस्टिस डीएन रे की बेंच ने अपने आदेश में साफ कहा कि ट्रस्ट ने न सिर्फ जमीन आवंटन की शर्तों का उल्लंघन किया बल्कि आसपास की खुली जमीन और यहां तक कि नदी किनारे की भूमि पर भी अवैध कब्जा किया.

क्या पाया कोर्ट ने?
कोर्ट ने रिकॉर्ड के आधार पर पाया कि ट्रस्ट ने आवंटित जमीन से ज्यादा क्षेत्र पर कब्जा किया. साबरमती नदी से जुड़ी करीब 51,101 वर्गमीटर जमीन पर अतिक्रमण किया गया. निर्माण के लिए जरूरी नक्शे की मंजूरी नहीं ली गई और कलेक्टर या ममलतदार से अनुमति का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला. बेंच ने कहा कि यह एक बार की गलती नहीं बल्कि लगातार किया गया उल्लंघन है. इसी आधार पर कोर्ट ने ट्रस्ट को ‘आदतन अपराधी’ तक करार दिया.

2009 से चला आ रहा है मामला
कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि साल 2009 में भी ट्रस्ट के खिलाफ कार्रवाई हुई थी, जिसमें उसे नदी क्षेत्र की जमीन से बेदखल किया गया था. इसके बावजूद नए अतिक्रमण सामने आए, जो मौजूदा विवाद का कारण बने.

स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स की दलील भी खारिज
ट्रस्ट ने यह तर्क दिया था कि इंटर-डिपार्टमेंटल कम्युनिकेशन के आधार पर जमीन पर कार्रवाई की जा रही है, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि ऐसे कम्युनिकेशन जमीन जब्त करने का कानूनी आधार नहीं बन सकते.

कोर्ट का साफ संदेश
कोर्ट ने कहा कि अगर आवंटन की शर्तों का उल्लंघन होता है तो सरकार किसी भी समय जमीन वापस ले सकती है. अतिक्रमण हटाने के लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है और इस मामले में कार्रवाई पूरी तरह वैध और कानून के अनुसार है. अंत में कोर्ट ने कहा कि ट्रस्ट अपने अवैध निर्माण को नियमित कराने का कोई ठोस आधार पेश नहीं कर पाया, इसलिए याचिका खारिज की जाती है.



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