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स्पेशल पब्लिक प्रोसिक्यूटर जियाउल कामर ने इस फैसले पर अहम जानकारी दी है. उन्होंने बताया कि कोर्ट ने आरोपियों को मर्डर और दंगे का भारी दोषी माना है. इन्हें सरकारी काम में बाधा डालने और जानबूझकर चोट पहुंचाने का भी दोषी करार दिया है. कामर ने कहा, ‘दोषियों को उम्रकैद से लेकर फांसी तक की सजा हो सकती है.’
भीड़ हत्या को लेकर असम कोर्ट ने 20 आरोपियों को दोषी करार दिया है. (फाइल फोटो)
गुवाहाटी. असम के नगांव में एक विशेष अदालत ने सोमवार को 2018 में कार्बी आंगलोंग में एक व्यवसायी और संगीतकार की पीट-पीटकर हत्या (लिंचिंग) के मामले में 20 आरोपियों को दोषी ठहराया. अफवाहें फैली थीं कि वे बच्चे उठाने वाले हैं. लाठियों और धारदार हथियारों से लैस एक भीड़ ने अभिजीत नाथ और निलोत्पल दास को ले जा रहे वाहन को रोका, उन्हें बाहर खींच लिया, उन पर हमला किया और मौके पर ही उनकी हत्या कर दी. दोनों दुर्लभ मछलियां पकड़ने जा रहे थे, तभी इलाके में बच्चे उठाने वालों के सक्रिय होने की अफवाहों से दहशत फैल गई. इस लिंचिंग की घटना से पूरे देश में आक्रोश फैल गया.
असम पुलिस ने इस मामले में 45 लोगों को गिरफ्तार किया और तीन नाबालिगों को हिरासत में लिया. 45 वयस्क आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई थी. गुवाहाटी हाईकोर्ट के निर्देश पर मुकदमे को कार्बी आंगलोंग से नगांव ट्रांसफर कर दिया गया था. नगांव अदालत ने सबूतों के अभाव में 25 आरोपियों को बरी कर दिया. अदालत 24 अप्रैल को 20 दोषियों के लिए सज़ा का ऐलान करेगी.
मुकदमे के दौरान बारह गवाहों की गवाही ली गई, जिनमें से आठ गवाह अपने बयान से पलट गए (होस्टाइल हो गए); उन्होंने दावा किया कि उन्हें सिखाया-पढ़ाया गया था और उन पर दबाव डाला गया था. बचाव पक्ष ने अभियोजन पक्ष के मामले को चुनौती देने के लिए गवाहों के बयानों में मौजूद विसंगतियों का सहारा लिया.
अभियोजन पक्ष ने यह तर्क दिया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 164 के तहत एक मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज किए गए बयान वैध सबूत माने जाते हैं. ट्रायल कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार कर लिया. अदालत ने कहा कि गवाहों के पहले के बयानों को केवल इसलिए नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि वे बाद में अपने बयान से पलट गए.
विशेष लोक अभियोजक जियाउल कामर ने बताया कि अदालत ने आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या), 143 (गैर-कानूनी जमावड़ा), 147 (दंगा), 149 (गैर-कानूनी जमावड़ा), 186 (सरकारी कर्मचारी के काम में बाधा डालना), और 332 (सरकारी कर्मचारी को उसके कर्तव्य से रोकने के लिए जानबूझकर चोट पहुँचाना) के तहत दोषी ठहराया है.
कामर ने कहा कि IPC की धारा 302 के तहत सज़ा आजीवन कारावास से लेकर मृत्युदंड तक हो सकती है, और अभियोजन पक्ष कड़ी सज़ा की उम्मीद कर रहा है. बचाव पक्ष ने यह तर्क दिया कि यह घटना अफवाहों से फैली दहशत के माहौल में हुई थी, और उन्होंने गवाहों के बयानों तथा जाँच प्रक्रियाओं के कुछ पहलुओं पर सवाल उठाए.
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राकेश रंजन कुमार को डिजिटल पत्रकारिता में 10 साल से अधिक का अनुभव है. न्यूज़18 के साथ जुड़ने से पहले उन्होंने लाइव हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज़, जनसत्ता और दैनिक भास्कर में काम किया है. वर्तमान में वह h…और पढ़ें


