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कागज के लिए मशहूर हुआ करता था कड़ा का कागजियाना, झेल रहा बेरोजगारी की मार

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कागजियाना मोहल्ले के लगभग 80 प्रतिशत लोग इसी कारोबार से जुड़े हुए थे और यही उनके परिवार के भरण-पोषण होता था. यहां की गलियों में हर घर से कारीगरी की झलक मिलती थी. कागज़ बनाने की पारंपरिक तकनीक ने इस मोहल्ले को एक अलग पहचान दी थी, लेकिन समय के साथ हालात बदलते गए. जैसे-जैसे मशीनों का दौर आता गया तभी से हाथ से बनने वाले कागज़ की मांग कम होती गई. धीरे-धीरे कागजियाना का यह कारोबार पूरी तरह बंद हो गया.

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कौशांबी: जनपद के कड़ा कस्बे में स्थित कागजियाना मोहल्ला एक ऐसा नाम, जो कभी कागज़ की कारीगरी की पहचान हुआ करता था, लेकिन आज वही मोहल्ला अपने सुनहरे अतीत की कहानी बयां करता नजर आता है. कागजियाना एक समय था जब यहां बड़े पैमाने पर हाथों से कागज़ बनाया जाता था. यहां पर कागज के कारोबार के लिए हर घर हौउद लगा रहता था.

कागजियाना मोहल्ले के लगभग 80 प्रतिशत लोग इसी कारोबार से जुड़े हुए थे और यही उनके परिवार के भरण-पोषण होता था. यहां की गलियों में हर घर से कारीगरी की झलक मिलती थी. कागज़ बनाने की पारंपरिक तकनीक ने इस मोहल्ले को एक अलग पहचान दी थी, लेकिन समय के साथ हालात बदलते गए. जैसे-जैसे मशीनों का दौर आता गया तभी से हाथ से बनने वाले कागज़ की मांग कम होती गई. धीरे-धीरे कागजियाना का यह कारोबार पूरी तरह बंद हो गया.

यहां के लोग बाहर चले गए कमाने

रोजगार खत्म होने के बाद अब इस मोहल्ले के ज्यादातर लोग काम की तलाश में बड़े शहरों का रुख कर चुके हैं. जो कभी अपने हुनर के लिए जाना जाता था, लेकिन अब यहाँ अधिकतर लोग सऊदी, दुबई, मुंबई जैसे तमाम देश व शहरों मे रहकर अपना भरण पोषण कर रहे है. कड़ा के कागजियाना कस्बा में कागज बनाने के लिए सभी के घरों में हउड बनाया जाता था. कागज बनाने के लिए भूसा,दप्ति, पाउडर, कई तरह की सामग्रियों का इस्तेमाल करके हउड मे डाल कर सड़ाया जाता था. उसके बाद जब वह पूरी तरह से गल जाता था तो उसे दिवाल मे पाउडर लगाकर चिपकाए जाता था फिर उसे सुखाया जाता था जब वह पूरी तरह से सुख कर कागज का रूप लेता था तब उसे बड़े-बड़े पत्थरों के नीचे दबाया जाता था ताकि प्रेस की तरह काम हो और कागज पूरी तरह से सीधा हो जाए.

यहां होता था कागज बनाने का कारोबार

ग्रामीण मोहम्मद शमी, हसन अहमद  ने बताया कि कड़ा कस्बा एक ऐतिहासिक के रूप में जाना जाता है क्योंकि यहां पर आज से कई वर्षों पहले कागज का कारोबार बड़े पैमाने में किया जाता था, इसलिए इस बस्ती का नाम कागजियाना पड़ा है. और अब इससे लोग कागजियाना के नाम सही जानते हैं। सभी दस्तावेजों में भी यही नाम दर्ज हुआ है. इस कस्बे की अधिकतर लोग हाथ से कागज बनाने का कारोबार करते थे जिससे लोगों का परिवार का पालन पोषण भी हुआ करता था. लेकिन धीरे-धीरे समय बदलता गया और हाथ के द्वारा बनाए हुए कागज की डिमांड भी कम होती गई क्योंकि मशीनी दौर में लोग मशीनों से बने हुए कागज को इस्तेमाल करना अधिक पसंद करते थे इसलिए हाथ से बने हुए कागज का कारोबार धीरे-धीरे बंद हो चुका है.

कागजियाना कस्बा में लगी कागज की फैक्ट्री भी लगाई गई थी लेकिन बड़े-बड़े शहरों में बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां लगने से इस कस्बे का विकास नहीं हो पाया है और धीरे-धीरे यहां की लगी हुई फैक्ट्री में बंद हो चुकी है. और घरों में हाथों के द्वारा बनाए गए कागजों का भी पूरी तरह से बंद हो चुका था. इसी वजह से कस्बे के अधिकतर लोग बाहर शहर विदेश के लिए पलायन कर चुके हैं और वहीं पर रहकर अपना रोजगार कर रहे हैं.

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Rajneesh Kumar Yadav

मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें



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