दिल्ली की तेज रफ्तार जिंदगी के बीच कुछ बच्चे ऐसे भी है. जिनका बचपन फुटपाथों और सड़कों पर बीत रहा है. कोई भीख मांगकर, कोई ट्रैफिक सिग्नल पर खिलौने बेचकर तो कोई कूड़ा बीनकर अपना पेट भरता है. लेकिन इन्हीं बच्चों के लिए दिल्ली का एक शिक्षक नई उम्मीद की कहानी लिख रहा है.
दिल्ली सरकार के एक स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक कृष्ण कुमार पिछले कई सालों से सड़क किनारे रहने वाले बच्चों को मुफ्त शिक्षा दे रहे है. शाम होते ही वह पार्क में खुली हवा में अपनी छोटी-सी क्लास लगाते है. जहां बच्चे किताब, कॉपी और पेंसिल लेकर पढ़ने पहुंचते है.
कृष्ण कुमार बताते है कि एक दिन उन्होंने कुछ छोटी बच्चियों को भीख मांगते देखा. उसी समय दिल्ली में बच्चों के अपराध और शोषण से जुड़ी खबरें लगातार सामने आ रही थी. तब उनके मन में विचार आया कि अगर इन बच्चों को शिक्षा मिल जाए तो उनकी पूरी जिंदगी बदल सकती है.
शुरुआत आसान नहीं थी. फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों के माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए राजी नहीं थे. कई परिवारों की रोज की कमाई बच्चों के भीख मांगने या छोटे-मोटे काम करने पर ही निर्भर थी. ऐसे में बच्चों को पढ़ने भेजना उन्हें नुकसान जैसा लगता था.
कृष्ण कुमार बताते हैं कि कई बार लोग उनका मजाक उड़ाते थे. कुछ कहते थे, इन बच्चों को पढ़ाकर क्या हासिल होगा. इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने धीरे-धीरे बच्चों से दोस्ती की, उनकी भाषा और व्यवहार पर काम किया और फिर पढ़ाई शुरू करवाई.
बच्चों के परिवारों ने एक शर्त भी रखी कि अगर बच्चे पढ़ने जाएंगे तो घर की कमाई रुक जाएगी. इसके बाद कृष्ण कुमार ने 4 परिवारों को हर महीने राशन देना शुरू किया ताकि बच्चे स्कूल जा सकें. आज भी वह अपनी कमाई से इन परिवारों की मदद कर रहे हैं.
कृष्ण कुमार सुबह सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाते है और शाम को फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों को शिक्षा देते है. उनका दिन सुबह 7 बजे शुरू होता है और रात देर तक चलता है. वह कहते हैं कि उनकी जिंदगी अब बेहद व्यस्त हो गई है. लेकिन रात को सोते समय यह संतोष रहता है कि वह किसी बच्चे का भविष्य बदलने की कोशिश कर रहे है.
अब तक वह 12 बच्चों का स्कूल में दाखिला करवा चुके है और कई अन्य बच्चे भी नियमित रूप से उनकी क्लास में आते है. उनका लक्ष्य है कि साल 2026 तक कम से कम 26 बच्चों को सड़क से निकालकर स्कूल तक पहुंचाया जाए. कृष्ण कुमार की अपनी जिंदगी भी संघर्षों से भरी रही है. आर्थिक तंगी के कारण उन्हें 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी. उन्होंने मजदूरी की, छोटे-मोटे काम किए और फिर दोबारा पढ़ाई शुरू की.
उन्होंने निजी स्कूल से पढ़ाई जारी रखी, BA, MA और B.Ed किया, NET परीक्षा पास की और आखिरकार दिल्ली सरकार के स्कूल में शिक्षक बने. उनका मानना है कि अगर शिक्षा उनकी जिंदगी बदल सकती है, तो यही शिक्षा इन बच्चों की दुनिया भी बदल सकती है. कृष्ण कुमार का विश्वास है कि शिक्षा ही वह ताकत है जो इंसान की पूरी जिंदगी बदल सकती है. उनके अनुसार पैसा खत्म हो सकता है, लेकिन शिक्षा हमेशा साथ रहती है.
आज उनकी यह छोटी-सी पहल कई बच्चों के लिए नई उम्मीद बन चुकी है. फुटपाथ पर रहने वाले ये बच्चे अब सपने देखना सीख रहे है. डॉक्टर बनने के शिक्षक बनने के और एक बेहतर जिंदगी जीने के.


