Explainer: पाकिस्तान क्यों ईरान – अमेरिका वार्ता अपने यहां करा रहा, उसे क्या फायदा, भारत पर क्या असर

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अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष को समाप्त करने के लिए बैक-चैनल बातचीत चल रही है. पाकिस्तान ने खुद को मुख्य मध्यस्थ के रूप में आगे किया है. इस्लामाबाद को बातचीत की जगह बनाने के लिए पेशकश की है. पाकिस्तान के पास ईरान के साथ मजबूत संबंध हैं. वहीं आर्मी चीफ असीम मुनीर के अमेरिकी प्रेसीडेंट डोनाल्ड ट्रंप से अच्छे रिश्ते हैं. माना जाता है कि पाकिस्तान इस समय दोनों पक्षों के बीच बैड चैनल से मध्यस्थ संपर्क का काम कर रहा है. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने स्पष्ट रूप से इस्लामाबाद को होस्ट करने की पेशकश की है, जबकि तुर्की और मिस्र भी सह-मध्यस्थ हैं.

ये मुख्य रूप से अमेरिका-ईरान द्विपक्षीय वार्ता है, जिसमें इजरायल प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं है. ईरान का रुख कठोर है. हालांकि इजरायल को लेकर अब भी कई सवाल हैं कि वो क्या इस बातचीत में किसी रूप में शामिल है या नहीं. ईरान तो इजरायल पर जरा भी विश्वास नहीं करता तो पाकिस्तान के इजरायल से किसी भी तरह के रिश्ते नहीं हैं.

28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल की ईरान के साथ छिड़ी जंग ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है. युद्ध के 24वें दिन अमेरिकी प्रेसीडेंट डोनाल्ड ट्रंप ईरान के बिजली संयंत्रों पर हमले को पांच दिन के लिए टाल दिया. उन्होंने कहा कि हमारी ईरान के साथ उत्पादक बातचीत हुई है. ये माना जा रहा है कि अब ये बातचीत सीधे और आमने – सामने होगी. ये पाकिस्तान में होगी.

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने 24 मार्च को एक्स पर पोस्ट किया कि “अमेरिका और ईरान की सहमति पर पाकिस्तान सार्थक और निर्णायक वार्ता की मेजबानी करने के लिए तैयार और सम्मानित महसूस करता है.” ट्रंप ने खुद इस पोस्ट को रीपोस्ट किया. सूत्रों के मुताबिक इस्लामाबाद में इस हफ्ते अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल और ईरानी अफसरों की बैठक संभव है. अमेरिका की ओर से इसमें उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, स्टीव विटकोफ और जैरड कुश्नर शामिल हो सकते हैं. ये घटनाक्रम पाकिस्तान को वैश्विक कूटनीति के केंद्र में ला खड़ा करता है. वैसे इजरायली अधिकारियों ने भी कन्फर्म किया कि इस हफ्ते इस्लामाबाद में बैठक की प्लानिंग चल रही है.

पाकिस्तान वार्ता क्यों अपने यहां करा रहा है?

पाकिस्तान का यह कदम रणनीतिक, भौगोलिक और कूटनीतिक मजबूरियों का नतीजा है. पाकिस्तान दोनों ही पक्षों यानि ईरान और अमेरिका से ठीक रिश्ते रखता है. हालांकि ईरान के साथ पाकिस्तान के रिश्ते पहले ऊपर नीचे होते रहे हैं. लेकिन पिछले कुछ सालों से दोनों देशों से रिश्तों में एक समझबूझ तो बनी हुई है. पाकिस्तान वो देश भी है, जिसने ईरान पर हमले की सबसे पहले निंदा भी की थी. ट्रंप प्रशासन वाले अमेरिका के साथ भी पाकिस्तान ने अपने रिश्ते बेहतर कर लिये हैं. कुल मिलाकर वो देशों से एक असरदार रिश्ते रखता है.
एक तो ईरान पाकिस्तान का पड़ोसी है तो दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शिया मुस्लिम आबादी वाला देश भी. बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि 1992 से ईरान का वॉशिंगटन इंटरेस्ट सेक्शन पाकिस्तानी दूतावास के जरिए चलता रहा है. वहीं अमेरिका से पाकिस्तान का पुराना सैन्य और राजनीतिक गठबंधन है. पाकिस्तान के आर्मी प्रमुख मुनीर के साथ ट्रंप प्रशासन के गर्मजोशी भरे रिश्ते. जनरल मुनीर ने जून 2025 में व्हाइट हाउस में ट्रंप से मुलाकात की थी. उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार देने के पक्ष में प्रस्ताव भी दिया था.
पाकिस्तान खुद को “क्रेडिबल गो-बिटवीन” के रूप में पेश कर रहा है. एक्सपर्ट कहते हैं, “पाकिस्तान के पास दोनों से काम करने वाले संबंध हैं और इतिहास की तनावपूर्ण यादें भी, जो इसे सही दूरी देती हैं.” तुर्की और मिस्र के साथ मिलकर पाकिस्तान ने पिछले 48 घंटों में मैसेज पास किए हैं.
क्षेत्रीय स्थिरता भी पाकिस्तान के अपने हित में है. अगर पाकिस्तान दोनों देशों के बीच शांति करा ले गया तो इसका उसे बहुत फायदा होगा, जैसा ऊपर भी कहा जा चुका है. खासकर उसकी अर्थव्यवस्था को राहत मिलेगी.

इससे पाकिस्तान को क्या फायदा होगा

– इससे पाकिस्तान को भविष्य में बहुत फायदा होगा. अमेरिका के ऊपर उसका विश्वास और बढ़ेगा, जिससे भविष्य में अमेरिकी नजदीकियां और फायदे मिलेंगे. दूसरे अंतरराष्ट्रीय स्तर उसके लिए ये मौका उसकी साख जमाने और अपने ऊपर अस्थिर और अराजक देश का ठप्पा हटाने का भी होगा. वह ये ठप्पा भी उतार फेंक सकता है कि वो आतंकवादियों की पनाहगाह है. अमेरिका का साथ उसे फायदा ही देगा. पहले भी इसी तरह की एक मध्यस्थता निभाने के बाद उसने दशकों तक अमेरिका और चीन की नजदीकियों का फायदा लिया है. यही काम इस बार फिर कर रहा है.
यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है. 1972 में इसी पाकिस्तान ने अमेरिका और चीन के बीच गुप्त कूटनीति का रास्ता खोला था, जो निक्सन की बीजिंग यात्रा का आधार बना. आज फिर वही “न्यूट्रल ग्राउंड” की भूमिका निभाने की कोशिश है.

क्या वाकई इससे पाकिस्तान वैश्विक स्तर पर अपनी इमेज सुधार पाएगा?

– ऐसा कहा जा सकता है. हालांकि ये बात भारत के लिए जरूर झटके वाली है. सालों से “आतंकवाद का केंद्र” की छवि झेल रहा पाकिस्तान अब “पीस मेकर” बनना चाहता है. मिडल ईस्ट पॉलिसी काउंसिल के एक्सपर्ट कमरान बोखारी कहते हैं कि दशकों बाद पाकिस्तान वैश्विक पटल पर फिर चमक रहा है. भारत के मुकाबले अपनी ग्लोबल स्टैंडिंग मजबूत कर सकता है. निक्केई एशिया के अनुसार, “यह पाकिस्तान को भारत से बेहतर पोजिशन देगा.”

पाकिस्तान को इससे किस तरह आर्थिक फायदा हो सकता है

– युद्ध खत्म होने पर ईरान के साथ ट्रेड और कनेक्टिविटी बढ़ सकती है. अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद पाकिस्तान-ईरान गैस पाइपलाइन और बॉर्डर ट्रेड को नई जान मिलेगी. ट्रंप ने पिछले साल पाकिस्तान को बेहतर टैरिफ टर्म्स दिए थे; अब मिनरल सेक्टर में निवेश और क्रिप्टो सहयोग का वादा भी किया है. पिछली बार ये अमेरिका ही था, जिसने आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक से पाकिस्तान को मोटे लोन की किस्त जारी कराई थी. वो सहायता फिर IMF और विश्व बैंक और अमेरिकी सहायता बढ़ सकती है युद्ध से तेल महंगा होने का नुकसान रुक जाएगा. संभव है कि आगे पाकिस्तान गल्फ में ईरान और दूसरे देशों के बीच मध्यस्थता का काम करे.

क्या इससे दुनिया की मुस्लिम लीडरशिप में भी एक जगह बना सकेगा

-पक्के तौर पर ऐसा हो सकता है. दुनिया के सबसे बड़े शिया आबादी वाले देश के रूप में पाकिस्तान मुस्लिम एकता का प्रतीक बनेगा. शरीफ ने पोस्ट में “मुस्लिम समुदाय में एकता” का जिक्र किया. हालांकि ये होना खतरनाक है. इसके जरिए भविष्य में पाकिस्तान मुस्लिम देशों के जरिए कश्मीर का कार्ड खेल सकता है. लिहाजा भारत को इस मौके पर सक्रिय होना पड़ेगा. इसका क्रेडिट पाकिस्तान की सेना और सिविलियन लीडरशिप दोनों को मिलेगा. ये मैसेज भी जाएगा कि एशिया में जनरल मुनीर की ट्रंप से खास दोस्ती है. पाकिस्तान की जनता को “बड़ा खिलाड़ी” बनने का गर्व महसूस होगा.

अगर वार्ता फेल हुई तो पाकिस्तान पर क्या असर पड़ेगा

– जोखिम भी हैं. अगर वार्ता फेल हुई तो पाकिस्तान की इमेज खराब हो सकती है. ईरान अगर नाराज हुआ तो बॉर्डर टेंशन बढ़ सकता है लेकिन पाकिस्तान का कैलकुलेशन साफ है – रिस्क कम, रिवॉर्ड ज्यादा. पाकिस्तान इसके जरिए ये भी दिखा सकता है कि ईरान और खाड़ी देशों के हितों में उसने इजरायल को इस मामले में अमेरिका से अलग कर दिया है.
हालांकि ये घटनाक्रम याद दिलाता है कि कूटनीति में कोई किसी का दोस्त, किसी का दुश्मन नहीं होता, केवल हित होते हैं. पाकिस्तान अपने हितों को साधते हुए शांति का दूत बन रहा है.

क्या इस बातचीत के नतीजों के बाद भारत को पाकिस्तान से ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत होगी

– हां,रणनीतिक सतर्कता की जरूरत होगी. हालांकि इस बातचीत के संभावित नतीजे भारत-पाकिस्तान संबंधों पर सीधा असर नहीं डालेंगे लेकिन पाकिस्तान की कूटनीतिक उछाल से क्षेत्रीय संतुलन थोड़ा बिगड़ सकता है. पाकिस्तान अगर सफल मध्यस्थ साबित होता है, तो उसे तीन बड़े लाभ मिल सकते हैं जो भारत को प्रभावित करेंगे. पाकिस्तान को “मेजर अमेरिकन एली इन वेस्ट एशिया” का स्टेटस मिल सकता है. उसे अगर इसे आर्थिक फायदा होना शुरू हुआ तो वो अफगानिस्तान और भारत दोनों देशों में अस्थिरता बनाए रखने के लिए टेरर पैदा करेगा
पाकिस्तान “ट्रबल्ड स्टेट” या “टेरर स्पॉन्सर” की छवि से “पीस मेकर” बन जाएगा.ये पाकिस्तान को भारत के मुकाबले “बेहतर ग्लोबल स्टैंडिंग” देगा.



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