नई दिल्ली. आज मैं किसी लिटिगेंट का न्याय नहीं कर रही बल्कि एक लिटिगेंट ने मुझे और इस पूरी न्यायपालिका को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है. दिल्ली हाई कोर्ट में जब जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने ये शब्द कहे तो वहां सन्नाटा पसर गया. दिल्ली के कथित शराब घोटाले की सुनवाई से जस्टिस शर्मा को हटाने के लिए अरविंद केजरीवाल ने एक-एक कर 8 तीखी दलीलें दीं, उनकी निष्पक्षता को चुनौती दी और उनके परिवार तक पर सवाल उठाए. लेकिन जस्टिस शर्मा न तो झुकीं और न ही पीछे हटीं. उन्होंने केजरीवाल के हर प्रहार पर कानून और न्यायिक गरिमा का ऐसा हथौड़ा चलाया कि पूरी याचिका ही ढह गई.
आसान रास्ता चुनकर केस से हटने के बजाय जस्टिस शर्मा ने डटकर मुकाबला करना चुना और साफ कर दिया कि अगर जज डराने-धमकाने और सोशल मीडिया कैंपेन से डरकर हटने लगे तो इस देश में इंसाफ का मंदिर ही ढह जाएगा. पेश है केजरीवाल की उन 8 दलीलों और जस्टिस शर्मा के उन तीखे जवाबों की पूरी दास्तां, जिसने न्यायपालिका के इतिहास में एक नई लकीर खींच दी है.
केजरीवाल की दलीलें बनाम जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के कड़े जवाब
| क्र.सं. | केजरीवाल की दलील (आरोप) | जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा का जवाब |
|---|---|---|
| 1 | केंद्रीय मंत्री अमित शाह के बयानों से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है, अतः पूर्वाग्रह का डर है. | नेताओं के बयानों पर कोर्ट का नियंत्रण नहीं. केजरीवाल खुद राजनेता हैं और राजनीति में विपक्षी दलों द्वारा ऐसी भाषा का प्रयोग सामान्य है. |
| 2 | जस्टिस शर्मा ने ‘अधिवक्ता परिषद’ (RSS विंग) के कार्यक्रमों में हिस्सा लिया जो उनकी वैचारिक निष्ठा पर सवाल उठाता है. | ये कार्यक्रम राजनीतिक नहीं, कानूनी थे. जजों और वकीलों का रिश्ता केवल कोर्ट रूम तक सीमित नहीं होता. केजरीवाल ने चयनात्मक (Selectively) तरीके से केवल इन्ही कार्यक्रमों को रिकॉर्ड पर रखा जबकि मैं NLU और अस्पतालों के कार्यक्रमों में भी जाती हूं. |
| 3 | जज के बच्चे केंद्र सरकार (UOI) के पैनल वकील हैं, जिससे ‘हितों का टकराव’ (Conflict of Interest) पैदा होता है. | पैनल में होना और इस केस से संबंध होना अलग है. CBI ने स्पष्ट किया कि मेरे किसी भी रिश्तेदार का शराब घोटाले से कोई लेना-देना नहीं है. लिटिगेंट यह तय नहीं कर सकता कि जज के बच्चे अपना करियर कैसे बनाएं. |
| 4 | जस्टिस शर्मा के आदेशों को सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया है (जैसे संजय सिंह केस), इसलिए उन्हें यह केस नहीं सुनना चाहिए. | एक जज की क्षमता का फैसला उच्च अदालत करती है, पक्षकार नहीं. संजय सिंह को राहत मेरिट पर नहीं बल्कि ED की रियायत (Concession) पर मिली थी. मेरा आदेश ‘सेट-असाइड’ नहीं हुआ था. |
| 5 | कोर्ट ने पहली ही सुनवाई में प्रतिकूल (Prima Facie) टिप्पणियां दीं, जिससे निष्पक्षता पर संदेह है. | जब इसी कोर्ट ने केजरीवाल और राघव चड्ढा के पक्ष में पहली तारीख पर अंतरिम राहत दी थी, तब निष्पक्षता पर सवाल क्यों नहीं उठे? क्या निष्पक्षता केवल पक्ष में फैसला आने पर ही मानी जाएगी? |
| 6 | न्यायिक निष्पक्षता के लिए जज को इस केस से खुद हट (Recusal) जाना चाहिए. | चुपचाप हट जाना ‘आसान रास्ता’ था, लेकिन जब प्रतिष्ठा पर झूठे आरोप लगाकर हमला किया जाए तो जवाब देना और पद पर बने रहना जरूरी है. अगर जज डरकर हटने लगे तो कोई भी लिटिगेंट अपनी पसंद का जज चुनने के लिए ऐसे दबाव बनाएगा. |
| 7 | सोशल मीडिया पर जज और उनके परिवार को लेकर चल रही जानकारियों से साख पर सवाल है. | 34 साल की न्यायिक सेवा के बाद मैं सोशल मीडिया से प्रभावित नहीं होती. अदालतें रिकॉर्ड और कानून पर चलती हैं, सोशल मीडिया कैंपेन पर नहीं. |
| 8 | वकीलों की राजनीतिक संबद्धता जज के फैसले को प्रभावित कर सकती है. | वकील किसी भी पार्टी से जुड़े हो सकते हैं, लेकिन जज मेरिट पर फैसला सुनाते हैं. विचारधारा के चश्मे से वकीलों या जजों को आंकना गलत है. |
सवाल-जवाब
अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को केस से हटने के लिए क्यों कहा था? केजरीवाल ने याचिका दायर कर जस्टिस शर्मा की निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे और दावा किया था कि उनके वैचारिक झुकाव और पारिवारिक संबंधों के कारण उन्हें उचित न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है.
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने ‘रिक्यूजल’ (केस छोड़ने) की मांग पर क्या कड़ा रुख अपनाया?
जस्टिस शर्मा ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि एक जज के लिए चुपचाप केस से हट जाना सबसे आसान रास्ता होता है, लेकिन जब प्रतिष्ठा पर हमला हो, तो जवाब देना और पद पर बने रहना जरूरी है.
केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के सामने अमित शाह के बयानों को आधार क्यों बनाया था?
केजरीवाल की दलील थी कि गृह मंत्री के बयानों से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है, लेकिन कोर्ट ने जवाब दिया कि राजनीति में विपक्षी दलों की बयानबाजी सामान्य है और कोर्ट का उस पर कोई नियंत्रण नहीं है.
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के सामने जज के बच्चों को लेकर केजरीवाल की क्या दलील थी?
केजरीवाल ने आरोप लगाया कि जज के बच्चे केंद्र सरकार के वकील (पैनल वकील) हैं. इस पर जस्टिस शर्मा ने कहा कि लिटिगेंट यह तय नहीं कर सकता कि जज के बच्चे अपना करियर कैसे बनाएं और उनका इस केस से कोई लेना-देना नहीं है.
अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रम में शामिल होने पर जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने क्या सफाई दी? कोर्ट ने कहा कि ये कार्यक्रम राजनीतिक नहीं बल्कि कानूनी चर्चा के लिए थे. जज ने कहा कि वह कई संस्थानों (NLU, कॉलेज, अस्पताल) के कार्यक्रमों में जाती हैं और केजरीवाल ने चयनात्मक तरीके से तथ्यों को पेश किया.
क्या सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के पिछले आदेशों को गलत ठहराया था? नहीं, जस्टिस शर्मा ने स्पष्ट किया कि संजय सिंह जैसे मामलों में राहत ED की रियायत पर मिली थी, न कि हाई कोर्ट के आदेश को मेरिट पर रद्द करने की वजह से.
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने ‘पक्षपात’ के आरोपों पर अरविंद केजरीवाल के ‘दोहरे मापदंड’ की बात क्यों की?
उन्होंने याद दिलाया कि जब इसी कोर्ट ने केजरीवाल और राघव चड्ढा के पक्ष में पहली तारीख पर अंतरिम राहत दी थी, तब किसी ने निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठाए. निष्पक्षता केवल पक्ष में आदेश आने पर नहीं मापी जा सकती.
सोशल मीडिया कैंपेन पर जस्टिस शर्मा की क्या राय थी?
उन्होंने कहा कि 34 साल की न्यायिक सेवा के बाद वह सोशल मीडिया की बातों से प्रभावित नहीं होतीं. न्यायिक फैसले केवल रिकॉर्ड और कानून के आधार पर लिए जाते हैं.
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने ‘वास्तविक संघर्ष’ और ‘प्रोजेक्टेड संघर्ष’ में क्या अंतर बताया?
जस्टिस शर्मा ने कहा कि इस मामले में कोई वास्तविक हितों का टकराव नहीं है, बल्कि ऐसा माहौल ‘पोर्ट्रे’ करने की कोशिश की गई है जिससे न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा कम हो.
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के अरविंद केजरीवाल को लेकन फैसले का व्यापक संदेश क्या है?
इस फैसले के जरिए कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया कि एक जज की क्षमता का फैसला उच्च अदालत करती है, लिटिगेंट नहीं. साथ ही, जजों को किसी दबाव या सोशल मीडिया ट्रायल के आगे झुकना नहीं चाहिए.


