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Bee Fencing Technique Benefits: उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में इंसान और हाथियों के बीच बरसों से चला आ रहा खूनी संघर्ष अब थमता नजर आ रहा है. तराई के इन इलाकों में हाथियों को खेतों से दूर रखने के लिए किसी कटीले तार या खतरनाक बिजली के फेंसिंग की नहीं, बल्कि नन्ही मधुमक्खियों की मदद ली जा रही है. एक बी-फेंसिंग (Bee-Fencing) तकनीक ने सेल्हा और टांडा छत्रपति जैसे दर्जनों गांवों की तस्वीर बदल दी है. हाथी मधुमक्खियों की भनभनाहट से इस कदर डरते हैं कि वे अब रिहायशी इलाकों का रुख ही नहीं करते. कमाल की बात यह है कि ये मधुमक्खियां न केवल किसानों की फसलों की रखवाली कर रही हैं, बल्कि शहद के जरिए उनके घरों में आर्थिक खुशहाली भी ला रही हैं.
पीलीभीत: यूपी स्थित पीलीभीत के तराई इलाकों में अब हाथी और इंसान के बीच का संघर्ष थमता जा रहा है. जिले के दर्जनों गांवों में अब लोग हाथियों के डर के साये में नहीं जीते. ग्रामीणों की इस भय मुक्ति की बड़ी वजह मधुमक्खियां हैं, जो न केवल ग्रामीणों को सुरक्षा दे रही हैं बल्कि उनके घर में शहद के जरिए आर्थिक खुशहाली भी ला रही हैं. यहां के ग्रामीणों को अब सुरक्षा के साथ-साथ मुनाफा भी मिल रहा है.
पीलीभीत के इन सीमावर्ती गांवों में पिछले काफी समय से हाथियों की आमद ने किसानों की रातों की नींद उड़ा दी थी. फसलों को नुकसान पहुंचाने के साथ ही जानमाल का खतरा भी बना रहता था. जिला मानव वन्यजीव संघर्ष समिति के सदस्य डॉ. अमिताभ अग्निहोत्री ने बताया कि ‘बी-फेंसिंग’ तकनीक ने यहां की तस्वीर पूरी तरह बदल दी है. इस तकनीक में खेत और जंगल की सीमा पर मधुमक्खियों के बक्से लगाए जाते हैं. वैज्ञानिक तौर पर हाथी मधुमक्खियों की भनभनाहट से बहुत ज्यादा घबराते हैं और इसी वजह से वे इन गांवों की ओर नहीं आते हैं.
सुरक्षा ऐसी कि न हाथी को चोट, न इंसान को खतरा
डॉ. अमिताभ अग्निहोत्री के अनुसार, यह प्रयोग सेल्हा और आसपास के गांवों में बेहद कारगर साबित हुआ है. पहले ग्रामीण हाथियों को भगाने के लिए शोर मचाते थे या खतरनाक तरीके अपनाते थे, जिससे कई बार हाथी हिंसक हो जाते थे. लेकिन अब मधुमक्खियों की मौजूदगी मात्र से हाथी खुद ही अपना रास्ता बदल लेते हैं. सबसे अच्छी बात यह है कि यह पूरी तरह से प्राकृतिक तरीका है जिसमें न तो हाथियों को कोई शारीरिक चोट पहुंचती है और न ही इंसानों को कोई खतरा होता है.
शहद ग्राम के रूप में उभर रहे गांव
इतना ही नहीं सुरक्षा के अलावा इस पहल ने ग्रामीणों के लिए स्वरोजगार के नए रास्ते भी खोल दिए हैं. सेल्हा जैसे गांवों को अब ‘शहद ग्राम’ के नाम से जाना जाने लगा है. यहां के किसान अब बक्सों से शुद्ध शहद निकालकर उसे बाजार में बेच रहे हैं, जिससे उनकी आय में काफी बढ़ोतरी हुई है. पीलीभीत टाइगर रिजर्व का यह शुद्ध शहद अब एक ब्रांड के रूप में पहचाना जा रहा है. M3M फाउंडेशन जैसी संस्थाएं भी इसे प्रमोट करने में जुटी हैं, जिससे किसानों को सीधा लाभ मिल रहा है.
ग्रामीणों के लिए फरिश्ता बनीं मधुमक्खियां
टांडा छत्रपति और ताल्लुके महाराजपुर के ग्रामीण अब मानते हैं कि मधुमक्खियां उनके लिए किसी फरिश्ते से कम नहीं हैं. WWF (विश्व प्रकृति निधि) के वरिष्ठ परियोजना अधिकारी नरेश कुमार ने बताया कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकने के लिए ऐसे प्रयास लगातार जारी हैं. उनका मुख्य उद्देश्य यह है कि संघर्ष कम हो और साथ ही ग्रामीणों को स्थानीय स्तर पर रोजगार के बेहतर अवसर मिलें. आज पीलीभीत का किसान हाथियों के डर से मुक्त होकर न केवल अपनी फसल काट रहा है, बल्कि शहद का व्यापार कर आत्मनिर्भर भी बन रहा है.
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सीमा नाथ पांच साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. शाह टाइम्स, उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम किया है. वर्तमान में मैं News18 (नेटवर्क18) के साथ जुड़ी हूं, जहां मै…और पढ़ें


